राजधानी

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दोषोंं को मन से निकालने पर ही हो सकती आत्मज्ञान की अनुभूति, आचार्य शंकर न्यास ने आयोजित की 92वीं शंकर व्याख्यानमाला

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भोपाल। मनुष्य के अंत:करण (मन) से जब तक तीन मुख्य दोष नहीं निकल जाते, तब तक उसे पूर्ण आत्मज्ञान की अपरोक्ष अनुभूति नहीं हो सकती। आचार्य शंकर न्यास द्वारा आयोजित की गई 92वीं शंकर व्याख्यान माला में यह बात स्वामी शक्तिशरणानंद पुरी ने ‘मल, विक्षेप और आवरण’ विषय पर विस्तार से प्रकाश डालते हुए कही। स्वामी जी का  यह व्याख्यान मुख्य रूप से आत्मसाक्षात्कार के मार्ग में आने वाली मानसिक बाधाओं और उनके शास्त्र-सम्मत निवारण पर केंद्रित रहा।  स्वामी जी ने तीनों प्रतिबंधकों की विस्तृत व्याख्या करते हुए कहा कि मल दोष यह हमारे चित्त में अनादि काल से जमे संस्कार, काम, क्रोध, लोभ, मोह और अहंकार हैं। स्वामी जी ने बताया कि मन की इस मैल को केवल ‘निष्काम कर्म’ (ईश्वरार्पण बुद्धि से, बिना फल की इच्छा के किए गए कार्य) और सेवा भाव से ही शुद्ध किया जा सकता है। वहीं विक्षेप दोष (चंचलता) रजोगुण के कारण मन का निरंतर अस्थिर रहना और सांसारिक विषयों में भटकना विक्षेप कहलाता है। इसके निवारण हेतु स्वामी जी ने ‘उपासना’, ध्यान, यम-नियम और अभ्यास-वैराग्य का मार्ग सुझाया, जिससे मन एकाग्र होता है। आवरण दोष मन के शुद्ध और एकाग्र होने के बाद भी सत्य के ऊपर अज्ञान का जो पर्दा रहता है, वह आवरण है। स्वामी जी ने ‘रज्जु-सर्प’ का उदाहरण देते हुए समझाया कि इस भ्रम को केवल वेदांत के महावाक्यों के श्रवण, मनन और निदिध्यासन रूपी ‘ज्ञान’ की अग्नि से ही नष्ट किया जा सकता है।