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आचार्य शंकर न्यास द्वारा 91वी शंकर व्याख्यानमाला ऑनलाइन आयोजित, केवल शाब्दिक ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति संभव नहीं: स्वामी मोहनानंद
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भोपाल। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, संस्कृति विभाग द्वारा 91 वीं ‘शंकर व्याख्यानमाला’ का आयोजन ऑनलाइन किया गया। व्याख्यानमाला में स्वामी मोहनानंद पुरी महाराज ने उपनिषदों और श्रीमद्भगवद्गीता के आलोक में ‘अक्षर ब्रह्म’ विषय पर अत्यंत गहन एवं प्रेरणादायी व्याख्यान प्रस्तुत किया।
स्वामी जी ने मुंडक और छांदोग्य उपनिषद का संदर्भ देते हुए परा विद्या और अपरा विद्या के भेद को सरल एवं स्पष्ट शब्दों में समझाया। उन्होंने कहा कि वेद, वेदांत सहित समस्त शब्द-ज्ञान ‘अपरा विद्या’ की श्रेणी में है, क्योंकि केवल शाब्दिक ज्ञान से अज्ञान की निवृत्ति संभव नहीं। वास्तविक ज्ञान ‘पर विद्या’ है, जिससे अविनाशी अक्षर ब्रह्म की प्राप्ति होती है। गीता के आठवें अध्याय का उल्लेख करते हुए स्वामी जी ने बताया कि भगवान कृष्ण ने ‘अक्षरं परमं ब्रह्म’ को जीवन का अंतिम लक्ष्य घोषित किया है। उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि संसार को सत्य मानना और शरीर को ‘मैं’ समझना अनादि काल का भ्रम है, जिसकी निवृत्ति केवल श्रवण, मनन और निदिध्सन के माध्यम से अपरोक्ष अनुभूति से ही संभव है। स्वामी जी ने समापन में कहा कि जो ब्रह्म समस्त भेदों से रहित है, वही हमारा वास्तविक स्वरूप है। आत्मज्ञानी महापुरुषों के सानिध्य से ही मोक्ष रूपी परम पुरुषार्थ की सिद्धि होती है। कार्यक्रम का प्रसारण एकात्म धाम के यूट्यूब चैनल पर किया गया, जिसमें देश-विदेश के जिज्ञासुओं ने वेदांत का श्रवण किया।
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