Breaking News:

• देर रात मप्र के आईपीएस की बड़ी तबादला सूची जारी, स्पेशल डीजी से लेकर सीएसपी स्तर के 62 अधिकारी स्थानांतरित देखें सूची • 18 साल के राजनीतिक वनवास के बाद यदुवंशी की जै जै .... • किसी को खराब प्रदर्शन की सजा तो किसी को मिला उत्कृष्ट प्रदर्शन का इनाम, आधी रात के बाद जारी की 62 आईपीएस अधिकारियों की स्थानांतरण सूची • पूर्व विधायक रेखा यादव अध्यक्ष, साधना सदस्य नियुक्त,6 साल बाद राज्य महिला आयोग में हुई नियुक्तियां • अर्थियां सजाकर मंत्री निवास को निकले, पुलिस ने रोका तो की धक्कामुक्की, जबलपुर की क्रूज दुर्घटना को लेकर युवा कांग्रेस का भोपाल में प्रदर्शन • भोपाल जिले के भाजपा कार्यकर्ताओं का प्रशिक्षण वर्ग 15-17 मई को, पार्टी नेताओं ने देखा प्रशिक्षण स्थल, कामकाजी बैठक में की समीक्षा
आध्यात्म

Image Alt Text

शंकर प्रकट न होते तो अज्ञात के अंधकार के रहता ज्ञान, आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के शंकर प्रकटोत्सव एकात्म पर्व का समापन

आध्यात्म

भोपाल। ‘प्रकट न होते श्री शंकर तो, तमस में रहता ज्ञान,उनकी कृपा हो हम सब पर ही, और रहे कृपा का भान’ अर्थात यदि शंकराचार्य का प्राकट्य न हुआ होता, तो ज्ञान अज्ञान के अंधकार में ही डूबा रहता। यह संबोधन अद्वैत की गहराई को उजागर करने के साथ-साथ जीवन में एकत्व की भावना को अपनाने का संदेश देता है। यह बात आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास के शंकर प्रकटोत्सव ‘एकात्म पर्व’ के समापन दिवस पर संबोधित करते हुए बीज वक्तव्य में स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती ने कही। 

अध्यक्षीय उद्बोधन में मप्र के संस्कृति एवं पर्यटन मंत्री धर्मेंद्र सिंह लोधी ने कहा कि आज का दिन केवल उत्सव नहीं, भारत की पारंपरिक चेतना के पुनर्जागरण का अवसर है । उन्होंने कहा कि एकात्म धाम को मप्र शासन द्वारा एकात्मता के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित करते हुए 2400 करोड़ की लागत से एकात्म धाम का निर्माण किया जा रहा है। वहीं दक्षिणामूर्ति मठ वाराणसी के प्रमुख स्वामी पूर्णानंद गिरि ने अद्वैत वेदांत की परंपरा और उसके साधना पक्ष को स्पष्ट करते हुए कहा कि जब वर्तमान समय में पूरी दुनिया विनाश की कगार पर खड़ी  है तब भी भारत विश्व में सुख और शांति का अनुभव कर रहा है। यह शंकराचार्य जैसे महान संतों के चरण विन्यास और उनके प्रभाव का ही फल है कि इस भूमि ने पवित्रता प्राप्त की है,और आज के समय में भी हम शांति की अनुभूति कर रहे हैं जो कोई साधारण बात नहीं है। स्वामिनी सद्विद्यानंद सरस्वती ने सभी सत्रों का सार प्रस्तुत करते हुए अद्वैत की समृद्ध परंपरा और विभिन्न संप्रदायों के योगदान को रेखांकित किया। माँ पूर्णप्रज्ञा, आवासी आचार्य, आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास ने कहा कि शंकराचार्य का जीवन केवल ज्ञान अर्जन तक सीमित नहीं था, बल्कि उन्होंने समाज में एकता, धर्म और आध्यात्मिक जागरूकता का संदेश भी फैलाया। उनका संपूर्ण जीवन त्याग, तपस्या और मानव कल्याण के लिए समर्पित रहा, जो आज भी करोड़ों लोगों के लिए प्रेरणा का स्रोत है। शंकर प्रकटोत्सव एकात्म पर्व के समापन अवसर पर जूना अखाड़ा के आचार्य महामंडलेश्वर स्वामी अवधेशानंद गिरि, चिन्मय मिशन के पूर्व वैश्विक प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद सरस्वती,  माँ पूर्ण प्रज्ञा, प्रख्यात शिक्षाविद् गौतम भाई पटेल, महंत मंगलदास त्यागी तथा वेंकटेश्वर वेद विज्ञान पीठम् के प्राचार्य ब्रह्मर्षि कुप्प शिव सुब्रमण्यम अवधानी उपस्थित रहे। कार्यक्रम में इस वर्ष के अद्वैत युवा जागरण शिविर के शंकरदूतों ने एकात्मता का संकल्प लिया। 

सिंहस्थ से पहले 17 हजार किमी की ‘एकात्म यात्रा’

न्यास के उप मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. शैलेन्द्र मिश्रा ने बताया कि ओंकारेश्वर को एकात्मता के वैश्विक केंद्र के रूप में विकसित किया जा रहा है। इसमें अद्वैत वेदांत पर केंद्रित संवाद, ध्यान, शास्त्रार्थ और वैदिक अनुष्ठानों का सफल आयोजन हुए। आगामी सिंहस्थ 2028 से पूर्व जनवरी से अप्रैल 2027 तक कलाड़ी से केदारनाथ तक लगभग 17 हजार किलोमीटर की ‘एकात्म यात्रा’ प्रस्तावित है, जिसमें विभिन्न आध्यात्मिक संस्थाएं सहभागी होंगी । 

विश्व के प्रत्येक कौने तक पहुंचे शंकर का संदेश 

स्वामी अवधेशानंद गिरि ने अपने वक्तव्य में एकात्मता के वैश्विक संदेश को प्रसारित करने का आह्वान किया। उन्होंने कहा कि अब समय आ गया है जब शंकरदूत केवल भारत तक सीमित न रहें, बल्कि आचार्य शंकर भगवत्पाद का संदेश लेकर विश्व के प्रत्येक कोने तक पहुंचें। उन्होंने कहा कि अब तक हम अपने धर्म और दर्शन का वैश्विक स्तर पर पर्याप्त प्रचार-प्रसार नहीं कर सके, परंतु अब यह सीमा तोडऩे का समय है। आचार्य शंकर के योगदान की तुलना द्वापर युग के वेदव्यास से करते हुए उन्होंने कहा कि जिस प्रकार वेदव्यास ने ज्ञान को व्यवस्थित किया, उसी प्रकार शंकराचार्य ने उसे पुनर्जीवित कर समाज तक पहुँचाया। कार्यक्रम में वीडियो माध्यम से जगद्गुरु श्रृंगेरी शंकराचार्य विधुशेखर भारती के आशीर्वचन भी हुए। 

अद्वैत के आलोक स्तंभों का सम्मान 

कार्यक्रम में चिन्मय मिशन के पूर्व प्रमुख स्वामी तेजोमयानंद जी को उनकी अखंड अद्वैत निष्ठा के लिए और प्रख्यात विद्वान प्रोफेसर गौतम भाई पटेल को संस्कृत वांग्मय और अद्वैत दर्शन में उनके अतुलनीय योगदान के लिए सम्मानित किया गया। प्रात: 6 बजे नर्मदा तट पर आयोजित दीक्षा समारोह में देश-विदेश के 700 से अधिक युवा ‘शंकरदूत’ के रूप में दीक्षित हुए। पंचम दीक्षा समारोह में देश-विदेश से लगभग 700 शिविरार्थियों को शंकरदूत के रूप में दीक्षा दी गई।