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मप्र में सपना बनकर रह गई भूमिगत केबलिंग योजना, साढ़े आठ साल पहले घनी आबादी और पर्यटन-धार्मिक महत्व के क्षेत्रों के लिए विद्युत मंत्रालय ने भेजा था प्रस्ताव

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भोपाल। मध्य प्रदेश के घनी आबादी वाले क्षेत्रों और पार्यटन व धार्मिक महत्व वाले स्थानों पर बिजली आपूर्ति भूमिगत केबलिंग के माध्यम से किए जाने का प्रस्ताव केन्द्रीय विद्युत मंत्रालय की ओर से साढ़े आठ साल पहले आया था। सरकार ने इस अनुदानित योजना के लिए विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) को विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बनाने के निर्देश भी सितम्बर 2017 में दिए थे। लेकिन डिस्कॉम की लापरवाही के चलते मप्र में यह काम अब तक अधूरा है। साथ ही कंपनियां भी हर साल अरबों रुपये का घाटा झेल रही हैं, जिसकी भरपाई हर साल सरकारी खजाने से की जाती है। 

भूमिगत केबलिंग की इस योजना को लेकर मध्यप्रदेश की विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम) की भारी लापरवाही महालेखापरीक्षक (सीएजी) की वर्ष 2025 की रिपोर्ट के माध्यम से सामने आई है। रिपोर्ट में बताया गया है कि भोपाल, नर्मदापुरम, ग्वालियर और चंबल जैसे संभागों में विद्युत वितरण और आपूर्ति का काम संभालने वाली मप्र मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने विद्युत मंत्रालय के निर्देशों को पूरी तरह अनसुना किया और न ही सघन आबादी वाले क्षेत्रों में और न ही धार्मिक व पर्यटन महत्व के स्थानों के लिए विस्तृत परियोजना रिपोर्ट (डीपीआर) बनाने पर विचार किया। मप्र पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी ने भेड़ाघाट, अमरकंटक, चित्रकूट और खजुराहो जैसे घार्मिक और पर्यटन महत्व के क्षेत्रों को नजर अंदाज कर सिर्फ ओरछा और मैहर के लिए 2.82 करोड़ लागत के कुल 12 किमी (ओरछा 9 किमी-1.77 करोड़, और मैहर 3 किमी-1.05 करोड़) यूजी केबलिंग का प्रस्ताव तैयार किया था। लेकिन ये प्रस्ताव अब तक धरातल पर कदम नहीं रख सके। योजना पर काम नहीं होने से केन्द्र सरकार से अनुदान भी नहीं मिल सका। हालांकि मप्र ऊर्जा विभाग ने हाल में इंदौर और उज्जैन के कुछ क्षेत्रों के लिए प्रस्ताव केन्द्र सरकार को भेजा है। 2024 में सरकार ने इन शहरों के अलावा भोपाल, जबलपुर, ग्वालियर, सागर एवं रीवा में भी बिजली चोरी वाले स्थानों पर भूमिगत केबलिंग की बात कही थी। 

मप्र में भूमिगत केबलिंग जुड़ी प्रमुख बातें 

क्या है योजना: भूमिगत केबलिंग का काम भारत सरकार की एकीकृत विद्युत विकास योजना (आईपीडीएस) और राज्य की शहरी सुधार योजनाओं के तहत किया जाता है।

उद्देश्य - खुले तारों से होने वाली दुर्घटनाओं को रोकना, शॉर्ट सर्किट कम करना, और आंधी-तूफान के दौरान बिजली कटौती से निजात पाना।

कहां-कहां होना था काम- यह कार्य मुख्य रूप से इंदौर, भोपाल, ग्वालियर, जबलपुर जैसे जिलों में पुराने शहरी क्षेत्रों और धार्मिक और पर्यटन महत्व के स्थानों पर होना था। 

किसे करना था काम : भूमिगत केबलिंग का काम मप्र मध्य क्षेत्र, मप्र मध्य क्षेत्र एवं मप्र पूर्व क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनियों को अपने-अपने कार्य क्षेत्र में कराया जाना था। 

भोपाल में बजट और डीपीआर का बहाना 

सीएजी ने लेखापरीक्षा के दौरान भोपाल में भूमिगत केबलिंग के संबंध में मध्यप्रदेश मध्य क्षेत्र विद्युत वितरण कंपनी लिमिटेड से सवाल किया तो नवम्बर 2024 में उत्तर मिला कि बजटीय सीमाओं और स्वीकृत डीपीआर के कारण, भोपाल शहर के कुछ महत्वपूर्ण स्थानों पर भूमिगत केबलिंग पड़ी हुई थी। हालांकि सीएजी ने इस उत्तर को पूरी तरह खारिज करते हुए रिपोर्ट में साफ किया कि भारत सरकार के 2017 के निर्देशों के अनुसार मध्य क्षेत्र विवि कंपनी ने यूजी केबलिंग के लिए कोई विशिष्ट डीपीआर नहीं की। इसके अलावा यूजी केबलिंग के लिए एक अलग फंडिंग व्यवस्था होने के बावजूद इसके लिए डीपीआर प्रस्तुत नहीं किए जाने से कंपनी उस फंड का उपयोग नहीं कर सकी। 

घाटे में चौथे नंबर पर मप्र की विद्युत वितरण कंपनियां 

वित्तीय वर्ष 2024-25 के आंकड़ों के अनुसार, मप्र की बिजली वितरण कंपनियों को भारी घाटे और कर्ज का सामना करना पड़ा। केंद्र सरकार की रिपोर्ट के अनुसार, 31 मार्च 2025 तक की स्थिति में मप्र की विद्युत वितरण कंपनियों (डिस्कॉम्स) पर संचित घाटा लगभग 71,394 करोड़ रुपये तक पहुंच गया था। जबकि मार्च 2025 तक कंपनियों पर कुल कर्ज 49,239 करोड़ बताया गया। राष्ट्रीय स्तर पर डिस्कॉम ने वर्ष 2025 में 2,701 करोड़ रुपए का कर पश्चात मुनाफा दर्ज किया। बिजली वितरण कंपनियों के कुल घाटे के मामले में पहले स्थान पर तमिलनाडु , दूसरे नंबर पर उत्तरप्रदेश, तीसरे नंबर पर राजस्थान और चौथे नंबर पर मध्य प्रदेश दर्ज किया गया है। घाटे का कारण तकनीकी और वाणिज्यिक नुकसान, बिजली दरों में समय पर संशोधन न होना, सरकारी विभागों का बकाया भुगतान और सब्सिडी की भरपाई देरी से होना बताया जाता है।

 ‘केन्द्र सरकार की हर योजना का लाभ मप्र को दिलाएंगे, हम भी केन्द्र को प्रस्ताव भेजेंगे और हर योजना पर गंभीरता से काम होगा। आरडीएसएस योजना में इंदौर और उज्जैन में भूमिगत केबलिंग के दो प्रस्ताव डीपीआर के साथ केन्द्र को भेजे हैं। स्वीकृति मिलते ही इस पर काम किया जाएगा।’

प्रद्युम्न सिंह तोमर, ऊर्जा मंत्री मध्यप्रदेश