आध्यात्म

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एकात्म धाम में प्रेरणा संवाद, प्रो. रामनाथ झा बोले-कबीर की वाणी का मूल आधार अद्वैत, जहां जीव और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं

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भोपाल। आचार्य शंकर सांस्कृतिक एकता न्यास, मध्यप्रदेश शासन संस्कृति विभाग द्वारा एकात्म धाम में प्रेरणा संवाद के अंतर्गत ‘कबीर की वाणी में अद्वैत’ विषय पर प्रेरणा संवाद एवं कबीर वाणी का गायन हुआ । संवाद में जवाहरलाल नेहरू विश्वविद्यालय, दिल्ली के प्राध्यापक रामनाथ झा मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहें। उन्होंने संत कबीर के पदों और उनकी वाणी में छिपे अद्वैत वेदांत के गहरे रहस्यों पर प्रकाश डाला।

 प्रो. झा ने कहा कि संत कबीर ने किसी पुस्तकीय ज्ञान के आधार पर नहीं, बल्कि अपने आत्म-अनुभव से अद्वैत तत्व को जिया और उसे अत्यंत सरल भाषा में समाज के सामने रखा। प्रो. रामनाथ झा ने कहा, कबीर की वाणी का मूल आधार अद्वैत ही है। जहां जीव और ब्रह्म में कोई अंतर नहीं है। आज जब समाज जाति, धर्म और संप्रदायों के नाम पर बंटा हुआ है, तब कबीर का यह अद्वैत दर्शन हमें जोडऩे का सबसे बड़ा माध्यम बन सकता है।

 घट-घट में राम का संदेश: प्रो. झा ने कबीर के दोहे ‘ऐसे घट-घट राम हैं, दुनिया देखत नाहिं’ का उल्लेख करते हुए कहा कि कबीर के राम वह निर्गुण-निराकार अद्वैत है जो सृष्टि के कण-कण और हर मनुष्य के भीतर व्याप्त है। जब ईश्वर सबके भीतर है, तो समाज में भेदभाव का कोई स्थान ही नहीं बचता। 

अद्वैत दर्शन ही आज समाज को जोडऩे का सबसे बड़ा माध्यम

प्रो. झा ने अद्वैत वेदांत और कबीर के विचारों की समानता को रेखांकित करते हुए कहा कि जैसे वेदांत में माया को भ्रम माना गया है, वैसे ही कबीर भी माया को महाठगिनी कहते हैं। कबीर के अनुसार, जब तक मनुष्य के भीतर ‘मैं’ (अहंकार) है, तब तक वह परमात्मा को नहीं पा सकता। अहंकार मिटते ही द्वैत समाप्त हो जाता है और केवल अद्वैत बचता है। प्रो. झा ने इस बात पर विशेष जोर दिया कि कबीर का अद्वैत केवल दार्शनिक व्याख्या तक सीमित नहीं था, बल्कि वह अत्यंत व्यावहारिक था। उन्होंने जल और कुंभ के उदाहरण से समझाया कि जैसे घड़ा फूटने पर भीतर और बाहर का जल एक हो जाता है, वैसे ही ज्ञान होने पर आत्मा और परमात्मा का भेद मिट जाता है। प्रो. झा ने युवाओं से कबीर के इस व्यावहारिक अद्वैत को अपनाने का आह्वान किया। इस अवसर पर शहर के गणमान्य नागरिक, प्राध्यापक, शोधार्थी और बड़ी संख्या में शंकरदूत उपस्थित रहे ।