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संपत्तियों की नीलामी कर सकता है वक्फ बोर्ड
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नीलामी को रोकने वाली याचिका उच्च न्यायालय से खारिज
भोपाल। वक्फ बोर्ड की संपत्तियों, कृषि भूमि की लीज को बोर्ड द्वारा नीलाम किया जा सकता है। बोर्ड द्वारा नीलामी की प्रक्रिया पूरी तरह वैधानिक है। इस तरह का आदेश मप्र उच्च न्यायालय की खंडपीठ ने इसके विरोध में लगाई गई याचिका को अस्वीकार करते हुए दिया।
अमीर आजाद अंसारी एवं अन्य ने वक्फ द्वारा कृषि भूमि की लीज नीलामी किए जाने के विरोध में मप्र उच्च न्यायालय में जनहित याचिका क्रमांक 18916 दायर की थी। न्यायाधीश विवेक अग्रवाल और विवेक जैन की खंडपीठ ने याचिका को निराधार बताते हुए अस्वीकार कर दिया।
याचिका में थीं प्रमुख दो आपत्तियां
याचिका में आपत्ति ली गई थी कि वक्फ बोर्ड के आदेश पर हस्ताक्षर करने वाली मुख्य कार्यपालन अधिकारी डॉ. फरजाना गजल पूर्णकालिक सीईओ नहीं हैं, जो कि वक्फ अधिनियम, 1995 की धारा 23 के खिलाफ है। दूसरी आपत्ति थी कि 1994 के एक पुराने परिपत्र के अनुसार वक्फ संपत्ति की नीलामी केवल मुतवल्ली द्वारा की जा सकती है, बोर्ड द्वारा नहीं।
आदेश में न्यायालय ने दिया स्पष्ट संदेश
याचिका की सुनवाई के बाद न्यायालय ने याचिकाकर्ता की दलीलों को पूरी तरह निराधार मानते हुए कहा कि डॉ. फरजाना गजल वक्फ अधिनियम की धारा 23 के प्रावधानों अनुसार एक मुस्लिम महिला, उप सचिव स्तर से उच्च स्तर की अधिकारी हैं, और इनकी सेवाएं उच्च शिक्षा विभाग से पिछड़ा वर्ग तथा अल्प संख्यक कल्याण विभाग में तीन वर्षों के लिए तीन डिपुटेशन पर ली गई हैं। फिर सरकार ने उन्हें वक्फ बोर्ड के मुख्य कार्यपालन अधिकारी का उत्तरदायित्व सौंपा है। उनके नियुक्ति आदेश में अस्थाई शब्द सीमित अवधि तीन वर्षों के के संदर्भ में उपयोग किया गया है, इससे अधिनियम के प्रावधान का उल्लंघन नहीं माना जा सकता है। अत: उन्हें पूर्णकालिक सीईओ न मानने का कोई आधार नहीं है। वहीं दूसरे बिंदु पर न्यायालय ने कहा कि 1994 का परिपत्र अब मान्य नहीं है क्योंकि उसे 2014 के वक्फ संपत्ति लीज नियमों ने प्रतिस्थापित कर दिया है। इन नियमों के अनुसार वक्फ संपत्तियाँ अब बोर्ड अथवा मुतवल्ली, दोनों द्वारा लीज पर दी जा सकती हैं।
बोर्ड के कामों को मिलेेगी प्रमाणिकता: डॉ. पटेल
मप्र राज्य वक्फ बोर्ड के अध्यक्ष डॉ. सनवर पटेल ने अपनी प्रतिक्रिया में कहा कि इस याचिका के खारिज होने से बोर्ड के कामों को प्रमाणिकता मिली हैं। हम न्यायालय के फैसले का स्वागत करते हैं। यह आदेश इस बात का भी सशक्त उदाहरण है कि, कैसे न्यायपालिका जनहित के नाम पर दायर दुर्भावनापूर्ण याचिकाओं से, नियमानुसार और कानून के मुताबिक संस्थाओं को संचालित करने वाले जनसेवकों की रक्षा करती है। इस निर्णय से यह भी स्पष्ट हो गया है कि अब तथ्यों से परे जाकर, तथ्यों को छुपा कर केवल गुमराह कर और कानून की गलत व्याख्या कर न्यायालय को गुमराह करने की कोशिशें सफल नहीं होगी।
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