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राजनीति

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गुजरात की तरह मप्र मंत्रिमंडल के पुनर्गठन की तैयारी!

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- बाहर होंगे आरोपों से घिरे मंत्री, जिनका प्रदर्शन अच्छा उन्हें फिर से मिलेगी जिम्मेदारी
भोपाल। गुजरात मंत्रिमंडल को पूरी तरह भंग कर जिस तरह से पुनर्गठन किया गया है। मध्यप्रदेश में भी इसी तरह मंत्रिमंडल पुनर्गठन के सकेत मिल रहे हैं। पार्टी नेतृत्व जिन मंत्रियों के कामकाज और कार्यशैली से संतुष्ट नहीं हैं एवं जिनके साथ वाद-विवाद और आरोप-प्रत्यारोप जुड़े हैं। ऐसे कुछ मंत्रियों को मंत्रि-परिषद से बाहर करने की तैयारी है। वहीं विभागीय कामकाज और योजनाओं में नवाचार के साथ अच्छा प्रदर्शन करने वाले मंत्रियों को न केवल फिर से मंत्रिमंडल में जगह मिलेगी, बल्कि सरकार और संगठन की प्राथमिकता वाले महत्वपूर्ण विभागों की जिम्मेदारी भी उन्हें मिल सकती है।  
कुछ मंत्रियों से संगठन भी नाराज
विभागों से आ रहीं गड़बडिय़ों की शिकायत एवं शासकीय कामकाज तथा योजनाओं के क्रियान्वयन के प्रति उदासीन, स्वयं के व्यवहार, कार्यशैली और विवादित बयानों से मीडिया की सुर्खियां बन रहे कुछ मंत्री भी मंत्रिमंडल से बाहर किए जा सकते हैं। पुनर्गठन के दौरान सामाजिक समन्वय या व्यवस्थागत कारणों से जिन्हें फिर से मंत्रिमंडल में रखना जरूरी होगा, उनके विभाग बदले जाना तय है।
मुख्यमंत्री के पास ही रहेंगे प्रमुख विभाग!
मप्र में मंत्रिमंडल पुनर्गठन के बाद नए अथवा फिर से शामिल किए गए मंत्रियों के ज्यादातर मंत्रियों के विभाग बदले जाना तय है। आबकारी, लोक निर्माण, स्कूल शिक्षा और परिवहन विभागों में फेरबदल तय माना जा रहा है। हालांकि सामान्य प्रशासन, औद्योगिक नीति एवं निवेश प्रोत्साहन, जनसंपर्क, विमानन, प्रवासी भारतीय, लोकसेवा प्रबंधन जैसे वर्तमान प्रभार मुख्यमंत्री के पास ही रहेंगे। हालांकि गृह एवं जेल एवं खनिज की जिम्मेदारी मुख्यमंत्री किसी वरिष्ठ मंत्री को सौंप भी सकते हैं।
मप्र में पहले भी लागू हुआ गुजरात का प्रयोग
गुजरात में सफल रहे प्रयोगों को भाजपा ने पहले भी दूसरे राज्यों में लागू किया है। 11 सितम्बर 2021 को गुजरात के तत्कालीन मुख्यमंत्री विजय रूपाणी के स्थान पर जिस अंदाज में पहली बार के विधायक भूपेन्द्र पटेल को विधायक दल का नेता चुना गया। ठीक उसी तरह पार्टी नेतृत्व ने मध्यप्रदेश में डॉ. मोहन यादव और राजस्थान में पहली बार के विधायक भजनलाल शर्मा पर विश्वास जताया। छत्तीसगढ़ में भी पूर्व केन्द्रीय मंत्री विष्णुदेव साय का नाम भी संभावितों की सूची में पहले से शामिल नहीं था। तीनों ही राज्यों में हुए इस प्रयोग सबसे सफलतम परिणाम पार्टी को लोकसभा चुनावों में सभी 29 सीटों पर जीत के रूप में मिले।