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मध्यप्रदेश

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नहीं भूल पाऊंगा उस नर्क की यादें: द्विवेदी

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यादें- मीसाबंदियों पर जेल में हुए अत्याचार की

भोपाल। जनजातीय समाज के 14 भोले-भाले निर्दोश कार्यकर्ता और तत्कालीन विधायक के साथ मेंटिनेंस ऑफ इंटरनल सिक्यूरिटी एक्ट (मीसा) में जेल जाना मेरे लिए वरदान की तरह रहा, वर्ना जेल में मीसाबंदियों के साथ हुए अत्याचारों की कहानी ही भयभीत करने वाली है। हालांकि जेल में बीते छह माह भी मेरे लिए किसी नर्क से कम नहीं थे, जिन्हें याद करके अभी भी सिंहर उठता हँॅू। उन बुरी यादों को भुला पाना आसान नहीं लगता। यह कहना है मीसा में जबलपुर जेल में छह माह तक निरुद्ध रहे लोकतंत्र सेनानी संघ के प्रदेश महामंत्री सुरेन्द्र द्विवेदी का। 

बैरक तक पहुंचती थी खुली शौच की दुर्गंध 

धारा 144 में गिरफ्तारी के बाद 21 दिनों तक जिन बैरकों में रखा गया। बैरक के पीछे ही खुले शौच थे। विधायक को उच्च श्रेणी की बैरक में भेजकर हमें विचाराधीन बंदियों के साथ सामान्य बैरकों में रखा गयायहां सभी बंदी बारी-बारी से शौच के लिए जाते थे। दिन में यहां सफाई हो जाती थी, लेकिन रात में इसकी दुर्गंध बैरकों तक पहुंची थी।

21 दिन बाद कलेक्टर ने लगाया मीसा

धारा 144 के तहत 21 दिन निरुद्ध रहने के बाद कलेक्टर ने उन पर मीसा की धाराएं लगा दीं। जेल में नखून काटने के लिए ब्लेड तक नहीं दी जाती। जेल सुरक्षाकर्मी ने सुझाव दिया पत्थर पर घिसकर नखून छोटे करें। जेल में सभी बंदियों के साथ नपा-तुला राशन मिलता। हालांकि कुछ समय बाद सभी बंदियों को मिला राशन इक_ाकर कार्यकर्ता ही भोजन तैयार करने लगे थे। 

गांव में था इसलिए सुरक्षित रहा परिवार

उस समय उम्र करीब 22 साल थी। पढ़ाई के लिए गांव पड़वार को छोडक़र 30 किमी दूर जबलपुर में तुलाराम चौक स्थित जनसंघ कार्यालय में रहता था। जनसंघ से जुड़े होने के कारण उन पर मीसा के तहत कार्रवाई हुई। चूंकि उस समय विवाह नहीं हुआ था, इसलिए पत्नी-बच्चों की देखरेख या भरण-पोषण जैसा मामला नहीं था। माँ और भाई गांव में थे, वे गिरफ्तारी से चिंतित तो थे, लेकिन सुरक्षित रहे। 

आधी रात में, नंगे पैर, पिछले दरवाजे से भागा 

भूमिगत होने के दौरान एक बार गांव पहुंचा। सूचना मिली तो पुलिस घर पहुंची। चूंकि संयुक्त परिवार के साथ घर भी बड़ा था। इस कारण पुलिस द्वारा दरवाजा खटखटाते ही परिजनों ने आधी रात में पिछले दरवाजे से भगा दिया। गांव के कच्चे रास्तों पर घनघोर अंधेरा और मैं नंगे पैर करीब एक किमी चला। पैरों में कांटे लग गए थे। लेकिन पुलिस से बचकर सुरक्षित निकल गया। हालांकि इसके बाद आंदोलन कर खुद गिरफ्तारी दी। 

मैं इस तरह बना मीसा बंदी 

22 साल का विधार्थी था और जबलपुर के जनसंघ कार्यालय में रहकर पढ़ाई के साथ-साथ युगधर्म समाचार पत्र में सिटी रिपोर्टर था। जनसंघ की व्यवस्था के अंतर्गत मीसा और सरकार की लोकतंत्र विरोधी नीतियों के खिलाफ छापे गए पर्चे बांटने का दायित्व मिला था।  इस बीच संगठन ने तय किया कि भूमिगत हुए कार्यकर्ता आंदोलन कर जेल जाएंगे। मंडला जिले के तत्कालीन विधायक अनूप मरावी, जानजाति समाज के 14 व तीन अन्य कार्यकर्ताओं के साथ आंदोलन करते हुए गिरफ्तारी हुई। छह माह मीसा में बंद रहा।