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कुरसी के फेर में मामा और मोहन के बीच कर्री ठनी, पंजाई पॉलिटिक्स में दल हुआ दलदल
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कुरसी के फेर में मामा और मोहन के बीच कर्री ठनी
Gossip गुगली। 20 साल तक एमपी पर एक छात्र राज करके भी मामा का मन नहीं भरा है। दिल्ली की छोटी कुर्सी पर बैठा मामा व्याकुल और बेचैन है। बार- बार सपनों में एमपी वाली कुर्सी आ रही है। दिल्ली वाली कुर्सी में तो मामा को कांटों सी चुभन महसूस हो रही है। मोहन पर दिल्ली वाले मुखिया की कृपा है सो खुलकर तो हिम्मत नहीं, लेकिन गाहे बगाहे मामा की भड़ास निकल ही जा रही है। अपना मोहन भैया भी मामा की हरकतों का जवाब उसी भाषा में देने में पीछे थोड़ी है।अंग्रेजी की कहावत "टिट फॉर टेट" के अंदाज में जवाब दिए जा रहे हैं। मोहन ने मामा के सारे दूत या तो ठिकाने लगा दिए हैं या मोहन के पाले में आकर मजे कर रहे है। परेशान मामा की मुस्कुराहट में भी फर्जीवाड़ा साफ देखा जा सकता है। हाल में गवालियर में अटल का "शाही दरबार" सजाया गया था । मोहन मुखिया के साथ, महाराज अपने हिस्से के सिपहसालारों के साथ बैठे थे। आगे की कुर्सियों पर मोहन के वजीर भी थे। अचंभा तब हुआ, अचानक मामा प्रकट हुआ, वह सामने से होकर महाराज तक पहुंचा, लेकिन मोहन की नजर तक मामा की ओर नहीं घूमी। इतना ही नहीं मामा के मुखिया रहते जो बाजीर बैठने की हिम्मत नहीं करते थे, मामा के आगमन पर ठाडे भी नहीं हुए।महाराज ने जरूर कुरसी पर बैठे- बैठे ही मामा की अगवानी की और उन्हें मोहन के निकट सटा दिया। आखिर शरमभारे मोहन ने नजर घुमाई और मामा का हाथ दबाया। मामा की अखड़ भी कहां झुकने वाली थी। गुनगुनी मुस्कुराहट के साथ मुलाकात ठंडी कर दी।पूरे कार्यक्रम में मामा - मोहन ने एक दूसरे से नजर तक नहीं मिलाई। इस वाकये को जिसने भी देखा वो बोल उठा - कुर्सी के फेर में मामा और मोहन में कर्री ठनी है।
पंजाई पॉलिटिक्स में दल हुआ दलदल
पंजा दल का भी एक टाइम था। नेता क्या कारकरता तक की हर जगह तूती बोलती थी। पेले अधकारी सामने ठड़े होने की हिम्मत नहीं करते थे, अब सीधे मौ बात तक नई करते। सत्ता है के बीसक साल हो गए लेकिन इधर मुंह करके देखना पसंद नई कर्रई है। नाथ टाइम में भले सवा साल मिले लेकिन इतने टेम में जो गर्राहट अपने अंदर घुसी थी अब तो वो भी ठंडी पड़ चुकी। ठन ठन हो चुके संघटन की नहीं, दल के नेता अब अपनी दुकानों के गल्ले की चिंता कर रए है। नाथ पैंतालीस साल में अपनी दुकान दिल्ली से जमा चुके हैं, तो राजा का एमपी से कमाया रेवेन्यू अब तक साथ दे रहा है। राजा के गुरुभाई "भैया"और सुभाष के सपूतों के दिन अब फिरने से रहे। कांति बनवास का मन बना चुके है तो तनख़ा अपनी कोट की दुकानदारी समालने में बिजी है। संघटन चलाने दिल्ली से दुकानदार भेजे जाते रहे है। अभी हरीश ने अपने हिसाब से काउंटर संभालने की कोशिश करी तो जीतू का माथा ठनक गया। अपनों के तनों, आरोपों, धमकियों और गुटबाजी से पराजित फफक फफक कर टिस्सू बहा चुके पंजा प्रमुख हरीश की उंगली से परेशान होकर दो बार काउंटर किसी और के हवाले करने की शिफारिश हाई कमान से कर चुके लेकिन ऐसे हालातों में कोई बैठने को राजी नई हो रिया। खैर ये बात जित्तू को पेले से पता है, तभी वो बार- बार कुर्सी त्यागने की शिफारिश कर डालते है। बेसे हाई कमान को शायद पता नहीं कि मोहन बंसी वाले की मेहरबानी से साज सिंघार भी अच्छा चल रिया है और अपने जित्तू भाई पर भी किरपा खूबई बरस रई है। तबई तो बयान हो या परदर्शन मोहन से जादा मामा या शाखा की तरफ दौड़ लेते है। ये पॉलिटिक्स की भाषा कार- करता और पप्पू नेता की समझ से परे है। क्यों पंजा दल नहीं दलदल होता जा रहा है। लोकल के नेता सब जन- समझकर भी मौन है! इधर या उधर आखिर अपने बेटे भी तो एडजेस्ट करने है।
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