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अतिक्रमण के कारण घाटे में भोपाल-इंदौर के आईटी पार्क
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कैग रिपोर्ट से उजागर हुईं मप्र के आईटी पार्कों की गड़बडिय़ां
भोपाल। सरकार के विभिन्न विभागों में, निगम-मंडलों, कंपनियों, सोसायटी आदि में सूचना प्रौद्योगिकी एवं आईटी सक्षम सेवाओं के प्रयोग को बढ़ावा देने के लिए मप्र के प्रमुख शहरों में स्थापित पांच आईटी पार्कों में से भोपाल और इंदौर का एक आईटी पार्क अतिक्रमण की चपेट में है। इस कारण दोनों आईटी पार्क को आर्थिक घाटे का सामना करना पड़ रहा है। अतिक्रमण के चलते शासन को इन आईटी पार्कों के लिए मिलने वाले विकास व्यय और भूमि प्रीमियम के रूप में मिलने वाली करोड़ों रुपये की राशि का नुकसान उठाना पड़ा।
मार्च 2023 को समाप्त वर्ष तक के कैग लेखापरीक्षा प्रतिवेदन में अभिलेखों की जांच के बाद यह स्पष्ट हुआ कि भोपाल और इंदौर के आईटी पार्कों में 13.57 एकड़ भूमि (3.68 प्रतिशत) पर स्थानीय निवासियों ने अतिक्रमण कर लिया था। इस कारण शासन को सडक़, जल आपूर्ति प्रणाली, सीवेज नेटवर्क, बिजली और पार्क जैसी बुनियादी सुविधाओं के लिए किए गए विकास व्यय के रूप में 3.63 करोड़ रुपये की हानि हुई। साथ ही एमपीएसआईडीसी भूमि प्रीमियम के रूप में मिलने वाली 2.28 करोड़ रुपये की अवसर लागत से भी वंचित रह गया, जो उस स्थिति में मिलता यदि दोनों आईटी पार्कों की भूमि पर हुए इस अतिक्रमण को रोकते और आवेदक फर्मों को भूमि आवंटित होती। खास बात यह रही कि एमपीएसआईडीसी के अभिलेखों में ऐसा कोई उल्लेख ही नहीं मिला कि अधिकारियों ने अतिक्रमणकारियों से भूमि खाली कराने के लिए कोई प्रयास किया। प्रबंधन ने भी भी आईटी पार्कों में अतिक्रमण के बारे में कोई विशिष्ट उत्तर नहीं दिया।
भोपाल-इंदौर में कितना-कितना नुकसान
भोपाल: भोपाल आईटी पार्क को कुल 212.63 एकड़ भूमि पर विकसित किया गया है। यहां कुल 8.46 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण है। 1 करोड़, 71 लाख, 25 हजार 510 रुपये भूमि प्रीमियम और 1 करोड़ 84 लाख 25 हजार 880 रुपये का विकास शुल्क मिलाकर कुल 3 करोड़, 55 लाख 51 हजार 390 रुपये का नुकसान हुआ।
इंदौर (सिंहासा): इंदौर आईटी पार्क को कुल 112.44 एकड़ भूमि पर विकसित किया गया है। यहां कुल 5.11 एकड़ भूमि पर अतिक्रमण है। 56 लाख, 88 हजार 963 रुपये भूमि प्रीमियम और 1 करोड़ 78 लाख 07 हजार 328 रुपये का विकास शुल्क मिलाकर कुल 2 करोड़, 34 लाख 96 हजार 291 रुपये का नुकसान हुआ।
327.85 करोड़ का अग्रिम भुगतान, हिसाब भी नहीं मांगा
मप्र आवास एवं अधोसंरचना विकास मंडल (एमपीएचआईडीबी) ने आईटी पार्कों के निर्माण/विकास के लिए एमपीएसईडीसी से 275.60 करोड़ एवं एमपीएसईडीसी की सहायक कंपनियों से 52.25 करोड़ मिलाकर कुल 327.85 करोड़ रुपये का अग्रिम भुगतान मार्च 2023 तक लिया। लेकिन व्यय का विवरण न तो एमपीएसईडीसी ने मांगा और न ही एमपीएचआईडीबी ने ही स्वयं दिया। जबकि आईटी भवनों का निर्माण मार्च 2018 से पहले ही पूरा हो चुका था। भवनों में आईटी फर्मों को स्थान आवंटित कर दिए गए थे और 2016 से नियमित रूप से किराया भी वसूला जा रहा था। आईटी नीति-2016 में एमपीएसईडीसी द्वारा सिंगल विंडो क्लीयरेंस सिस्टम की स्थापना की जानी थी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। कैग ने पाया कि मप्र के आईटी पार्कों के लिए प्रबंधन ने न तो दीर्घकालिक योजना तैयार की और न ही संगठन ने अगले तीन से पांच वर्षों के लिए दृष्टिकोण, मिशन, लक्ष्य और रणनीति तय की। पहले आओ-पहले पाओ के आधार पर आईटी पार्कों में भूखंड एवं स्थान आवंटन में भी कमियां देखने को मिलीं।
ब्लैकलिस्ट फार्म का संदेहास्पद प्रशिक्षण
निवेश सलाहाकार के रूप में पंजीकृत फर्म मेसर्स स्टार इंडिया मार्केट रिसर्च पर सेवी ने नवम्बर 2019 में प्रतिबंध लगाया था। इस फर्म ने 31 दिसम्बर 2015 से 12 अप्रैल 2018 के बीच 935 लोगों को प्रशिक्षण दिया। जिसके लिए एमपीएसआईडीसी ने 93.50 लाख का भुगतान किया। जांच में पता चला कि कंपनी ने प्रशिणार्थियों से उनके कोई दस्तावेज नहीं किए थे और फर्म के परिसर में कुल 300 व्यक्तियों के बैठने की क्षमता थी।
प्रबंधन की यह कमियां भी आईं सामने
- आईटी पार्कों में स्थानों के आवंटन की प्रक्रिया और भूखंडों के आवंटन की प्रक्रिया के बीच व्यापक अंतर देखने को मिला।
- भूखंड आवंटन के लिए उपलब्ध भूमि से संबंधित सूचना वेबसाइट के माध्यम से अपलोड कर एवं समाचार पत्रों में अधिसूचना के माध्यम से प्रकाशित की जानी थी। जो नहीं किया गया। एमपीएसआईडीसी ने नवम्बर 2020 में पहले आओ-पहले पाओ से भूखंड आवंटन प्रक्रिया में बदलाव किया। लेकिन आईटी भवनों का आवंटन इसी आधार पर जारी रहा। इससे 29.27 करोड़ राशि निष्क्रिय निवेशित और अवरुद्ध हुई।
- पट्टा अनुबंध के निष्पादन में देरी के कारण आवंटन रद्द नहीं किया गया।
- भूमि आवंटन के लिए ऑनलाइन निविदा जारी नहीं की गईं।
- विवादित भूखंडों के विकास पर अनावश्यक राशि खर्च की गई।
- एमपीएसआईडीसी द्वारा भूमि आवंटितयों से रखरखाव शुल्क के रूप में 99.78 करोड़ रुपये नहीं वसूले।
- विकास शुल्क का परीक्षण नहीं किया गया।
- पट्टाधारियों द्वारा स्थान/पट्टा शुल्क का भुगतान न करने के बावजूद पट्टे निरसत नहीं किए गए।
- कौशल अंतर प्रशिक्षण के लिए सब्सिडी की अनियमित प्रतिपूर्ति की गई।
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