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छूटने का भरोसा नहीं है, यह बोलकर पिता ने भेजा जेल
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भैया को देरी हुई तो पिताजी बोले टॉकीज में इंटरवल होने वाला है, तुम जाकर पर्चे बांटो
भोपाल ।आपातकाल के खिलाफ पर्चे बांटने जाते समय पिता जी ने कहा था, गिरफ्तारी हो सकती है, पिटाई भी होगी और जेल भी जाना पड़ेगा। भरोसा नहीं है, जेल से कब छूटोगे। फिर भी मैं चाहता हँू कि तुम भी आपाताकाल के खिलाफ अदोलन का हिस्सा बनो। पिता की इस समझाइश पूर्ण सहमति के साथ मैंने टॉकीज में पर्चे बांटे, गिरफ्तारी हुई। पुलिस की यातनाओं को भी सहा और फिर कई वरिष्ठ पदाधिकारियों और कार्यकर्ताओं के साथ मीसा में 16 महीने की जेल काटी। यह कहना है संत हिरदाराम नगर (बैरागढ़), भोपाल निवासी लोकतंत्र सेनानी (मीसा बंदी) नरेश वासवानी का।
इस तरह टॉकीज से हुई मेरी गिरफ्तारी
आपातकाल में इंदिरा गांधी के अत्याचारों के खिलाफ आवाज बुलंद करने के संकल्प के साथ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ ने अपने स्वयंसेवकों को आंदोलन का आदेश दिया। स्वयंसेवक बढ़-चढक़र आंदोलन कर रहे थे। आंदोलन के सूत्रधारों, संघ पदाधिकारियों तक पहुंचने के लिए पुलिस पकड़े गए आंदोलनकारियों पर अमानवीय अत्याचार कर रही थी। ऐसी स्थिति में संघ के भोपाल जिला संघचालक हमारे पिताजी नारायण दास वासवानी ने सिंधू टॉकीज बैरागढ़ में आपातकाल के खिलाफ पर्चे बांटने का आदेश बड़े भाई को दिया। टॉकीज में इंटरवल होने वाला था और भाई को पहुंचने में देरी हो रही थी तो पिताजी ने मुझे पर्चे बांटने का आदेश दिया। उस समय उम्र कुल साढ़े 18 वर्ष थी। बड़ी बहिन भी मेरे साथ पर्चे बांटने पहुंची। पर्चे उछालते ही मुझे पुलिस ने गिरफ्तार कर लिया।
जेल पहुंचकर लगा कि स्वर्ग पहुंच गया
शनिवार को गिरफ्तारी के बाद से ही दो दिन पुलिस के खूब लाठियां भांजीं। आंदोलन और पदाधिकारियों के बारे में वे बहुत कुछ जानना चाहते थे, लेकिन हर तरह की कोशिश के बावजूद पुलिस आंदोलनकारियों का मुंह नहीं खुलवा सकी थी। दो दिन तक पुलिस के अत्याचारों के बाद सोमवार को कलेक्टर ने जेल भेजा तो पहुंचकर लगा जैसे स्वर्ग आ गया। यहां पहले से गिरफ्तार हो चुके कई पदाधिकारी और कार्यकर्ता मिले और जेल में बंद होने बावजूद सामान्य दिनचर्या आरंभ हो गई। चूंकि पिता के आदेश और परिजनों की सहमति से जेल गया था, इसलिए कोई भी अधिक चिंतित और परेशान नहीं हुआ।
परिजनों को परेशान करती रही पुलिस
जेल अवधि के दौरान पुलिस कई बार घर पहुंची और परिजनों से पूछताछ कर उन्हें परेशान किया। जेल में भी परिजनों को 15-20 दिन में मिलने का मौका मिल पाता था। छूटने के बाद परिजन बहुत खुश हुए। विधानसभा का चुनावी माहौल था इसलिए राजनीति से जुड़ गया।
पीएमटी में छूट का नहीं लिया लाभ
वासवानी बताते हैं कि जेल से छूटने के बाद मेडिकल प्रवेश के लिए पीएमटी दिया, जिसमें 59 प्रतिशत अंक आए। चूंकि मीसा बंदियों के लिए सरकार ने एक प्रतिशत का कोटा अलग से दिया था, लेकिन मैंने उसका लाभ नहीं लिया। उधर बैंक से भी नौकरी का प्रस्ताव आया, लेकिन मैंने अपना कारोबार शुरू किया। अब बच्चों के साथ मिलकर अपना कारोबार देखता हँू।
पत्नी पार्षद, भाई आवास संघ के अध्यक्ष रहे
श्री वासवानी बताते हैं कि 92 वर्ष की उम्र में करीब 8 साल पहले पिताजी और बड़े भाई का निधन हो चुका है। तीनों भाई अभी भी एक साथ रहते हैं। पत्नी श्रीमती दीपा वासवानी वार्ड क्र. 5 की पार्षद और पार्टी में जोन-1 की अध्यक्ष रह चुकी हैं। इसके अलावा सबसे बड़े भाई आवास संघ के अध्यक्ष रह चुके हैं। परिवार में दो बेटे और एक बेटी है, तीनों का विवाह हो चुका है। बच्चे उद्योगिक कारोबार संभालते हैं।
गांधी की हत्या के बाद पिता गए थे जेल
श्री वासवानी बताते हैं कि पिताजी शुरू से ही राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ से जुड़े रहे। 1948 में गांधी जी की हत्या के बाद जब संघ पर प्रतिबंध लगाया गया था, तो पिता जी को एक महीने तक जेल भेजा गया था।
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